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क्या प्रेम शारिरिक सम्बंध के बगैर अधूरा है? क्या इससे इतर लगाव प्रेम नहीं है?

 

मानव का शरीर भावों का भंडार है। इसमें एक नहीं हजार तरह के भाव है। परिस्थितियों के अनुसार कभी कोई भाव सक्रिय हो जाता है तो कभी कोई। जैसे कुछ प्रमुख है, - हास्य, नाराजगी, भय, गुस्सा , शर्माना, संकोच, अपराध बोध, इनके अतिरिक्त कुछ मूल शरीरिक आवश्यकताये है जैसे —भूख, नींद , और इसी की श्रेणि में आती है यौन उत्तेजना। ये आवश्यकताएं होने के साथ साथ भाव भी है।

अब आती है बात सबसे ऊंचे भाव की यानी प्रेम की ।तो मेरा कहना है की शारिरिक संबंधों (सेक्स) का प्रेम से कोई लेना देना है ही नहीं। यह सब भौतिक क्रियाएं हैं और प्रेम भौतिक क्रियाओं से परे है ।

दुनिया के सारे भौतिक सुख मिलकर भी प्रेम के एक छोटे से अंश के भी बराबर नहीं। क्योंकि इसके बारे में सोचने मात्र से व्यक्ति का मन एक अलौकिक आनंद से भर जाता है। तो सोचिये जब यह प्रज्वलित होता है तब क्या होता होगा।

प्रेम के भले ही कई प्रकार हैं लेकिन कोई सा भी प्रेम शारिरिक संबंधों से नहीं जुड़ा होता चाहे वह पत्नी से हो या किसी भी अन्य महिला से। फिर शारीरिक संबंधों की यह व्यवस्था क्या है इसका क्या अर्थ है,

शारीरिक संबंधों का अर्थ समाज समाज द्वारा किसी व्यक्ति विशेष से यौन संबंध स्थापित करने की स्वीकृति से है ताकि व्यक्ति अपनी यौन आवश्यक ताओं की पूर्ति कर सके।। इस व्यवस्था के अनुसार किसी व्यक्ति विशेष से यौन ही संबंध स्थापित किये जा सकते हैं। हर किसी से नहीं ।

शारीरिक संबंधों का उद्देश्य क्या है, सेक्स के दो उद्देश्य हैं,

१. संतान उत्पत्ति

२. एक भौतिक आनंद।

यह अन्य मूल आवश्यकताओं जैसे भोजन, नींद आदि के समान एक मूल आवश्यकता है।

लेकिन जहाँ प्रेम की बात आ जाए तो यह सब कुछ भी नहीं,। प्रेम के आगे यह सब चीजें गौड़ है।

आपने सुना होगा - दो प्रेमियों को कहते हुए कि मेरी नींद उड़ गयी है। मेरी भूख गायब हो गयी है इसके साथ ही तीसरी आवश्यकता यौन आवश्यकता उसका भी अता पता नहीं रहता। (हालाँकि लोग इसका नाम नहीं लेते क्योकि यह व्यक्तिगत विषय है।) लेकिन सच में व्यक्ति कहीं खो जाता है। किसी अजीब से एहसास में खो जाता है। यही एहसास प्रेम है। व्यक्ति को अपने प्रेमी के पास आने की उसके बाहों में खो जाने की तमन्ना होती है।

प्रेम और सेक्स पूरी तरह से दो अलग अलग चीजें है। क्योंकि प्रेम तो हम कयी लोगों से करते है। सेक्स प्रेम पर कोई प्रवाह नहीं डालता।

लोग सेक्स करते है फिर भी उनके बीच लड़ाई झगड़े, क्लेश, विषमताएँ होतीं है और फिर अलगाव तक हो जाता है।। ये प्रेम हुआ ?????? कैसी विडंबना है यह।

जो लोग सेक्स को प्रेम समझते है वो तो नादान/ अज्ञानी हैं ही, उनसे से बड़े दर्जे के अज्ञानी वो है जो शारीरिक संबंधों को प्रेम से जोड़ते हैं या फिर कहते हैं कि सेक्स प्रेम का एक हिस्सा है। सेक्स समाज द्वारा स्थापित व्यवस्था और मानव की भौतिक आवश्यकताओं का हिस्सा है प्रेम का नहीं।

कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से प्रेम करता है तो उसे भली-भांति पता है प्रेम का भाव क्या है और शारीरिक संबंध क्या है ? अगर कोई अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी से वाकई में सच्चा प्यार करता है तो वह देखता है कि उसे उसकी पत्नी पास होनी चाहिए भले ही उसे यौन सुख नहीं मिल पा रहा हो किसी कारण । उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि वो उससे प्रेम करता है जो अपने आप में संपूर्ण है। उसे अपनी पत्नी चाहिए उसका शरीर नहीं। उसकी एक झलक उसका एक आलिंगन ही अपने आप में संपूर्ण है।

व्यक्ति प्रेम अपनी माँ से भी करता है। अपनी बहन से भी करता है। एक तर्क से समझिये,

किसी व्यक्ति की बहन उसकी पत्नी से अधिक सुंदर और आकर्षक हो सकती है लेकिन नियमों और समाज द्वारा स्थापित किए गए उसका उसके साथ एक पावन रिश्ता है एक मर्यादा है। उसकी नजर उसकी सोच अपनी बहन के लिए अलग है। एक अलग भाव है। लेकिन प्रेम तो है ना। इसी प्रेम को व्यक्ति नाना प्रकार से व्यक्त करता है। अपनी माँ के लिए नाना प्रकार से व्यक्त करता है। अपनी पत्नी के लिए नाना प्रकार से करता व्यक्त है। अपनी बेटी के लिए अनेक प्रकार से व्यक्त करता है।

प्रेम का भाव सबसे जुदा, सबसे अलहदा है। जिसे किसी पैमाने पर मापा नहीं जा सकता है।

अंत में इस व्याख्या के बाद , प्रश्न पर लौटते है, तो इसका उत्तर है -

नहीं ।

प्रेम शारिरिक संबंधों (सेक्स) के बिना अधूरा नहीं है। क्योंकि प्रेम अपने आप में ही संपूर्ण है। इस पर किसी भी भौतिक आवश्यकता का प्रभाव नहीं पड़ता। इसे पूर्ण होने के लिए किसी भौतिक सुख की आवश्यकता नहीं।

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